पुलिस की व्यथा

हमारी पुलिस की सच्चाई और व्यथा
_____________________________________
निवण प्रणाम /नमस्कार सभी महानुभावों को ।
जैसा कि हमने देखा है कोरोना के काल में पुलिस की अहम भूमिका रही है।
पुलिस ने जान की परवाह किए बिना आम जनता में विश्वास और भरोसे का प्रतीक बनकर सेवा दी है।
दिन रात पुलिस ने महामारी में परिवार और माता पिता से दूर रहकर नि स्वार्थ सेवा भाव से कर्तव्य का वहन किया है।
लेकिन एक और हम पुलिस से न्याय को उम्मीद करते है वहीं दूसरी ओर पुलिस को राजनीती और सत्ता की ताकतों से दबकर काम करना पड़ता हे। ये जमीनी स्तर की हकीकत/ सच्चाई है।
एक तरफ जब कोई अपराध होता है तो लोग और राजनीती से जुड़े लोग पुलिस से अपराधियों को पकड़ने को कहते हे। और पुलिस से त्वरित कार्यवाही का दबाव डालते है।
वहीं जब पुलिस अपराधी को पकड़ लेती है। और उसकी अचानक तबियत खराब होने से अगर उसकी मौत हो जाती है। या उसको पकड़ते समय वही अपराधी गोली चला दे और उस गोली बारी में वो अपराधी मारा जाए तो वो ही नेता पुलिस के खिलाफ़ खड़े हो जाते है।
आखिर क्यों उस अपराधी की गोली से अगर पुलिसकर्मी की मौत होती है। तो कोई नही बोलता है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे सब को साप सुंग गया हो।
आखिर क्यों लोगो के मन से धर्म और न्याय की भावना खत्म हो गई। लोग अधर्म और अन्याय का साथ देने लग गए।
कुछ स्वार्थ के कारण लोग पुलिसकर्मियों के खिलाफ झूठ मूठ की शिकायते करते है। उनको बदनाम करते है। बस लोगों में अपना सिक्का जमाने के लिए एक पुलिसकर्मी का राजनीती पावर से ट्रांसफर करवा कर अपने आप को क्या समझने लग जाता है। जैसे कोई देश जीत लिया हो।
उन्ही छोटे कर्मचारी जैसे एक कांस्टेबल के खिलाफ़ अगर कोई व्यक्ति शिकायत करता है।तो उसकी जांच सबंधित थानाधिकारी या सीओ  को दी जाती है। तो कोई ही भला आधिकारी होगा जो उस कांस्टेबल की बात सही तरीके और शान्ति से सुनेगा । वरना लगभग सभी अधिकारी उस कांस्टेबल के ही गले पड़ते है। और हजारों बाते सुनाते है।
आखिर क्यों उसका पक्ष नही सुनते है। एक जमीन स्तर पर अगर कोई कर्मचारी काम करेगा तो उससे कुछ गलतियां भी होगी इसका ये मतलब उसको प्रताड़ित होना पड़े। वो मानसिक रूप से कितने ही माह तक परेशान रहता है।
आखिर क्यों । बड़े पद वाले हकीकत में अपना 100 प्रतिशत देने वाले कर्मचारी की क्यू नही सुनते हैं।
लेकिन हकीकत ये है कि पुलिस का 90% काम एक सिपाही करता है।
तो उस सिपाही की इज्जत और अधिकार क्यों नहीं।
एक सिपाही की शिकायत पर कितने ही प्रकार की विभागीय जांच की जाती है। उसको इतना परेशान किया जाता है जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।
अगर सिपाही न्याय के लिए कोर्ट चला जाय तो उसको अधिकारी इतना परेशान करते है। हद से ज्यादा 
बस इन अधिकारियो के खिलाफ़ कोई नही बोलना चाहिए।
और हकीकत ये है भ्रष्टाचार बड़े आधिकारी भी करते है। उनका कोई कुछ नही करता। 
उनके खिलाफ़ कोई नही सुनता।
ना कोई उनके खिलाफ़ कार्यवाही होती है।
ये सच्चाई है। ये हकीकत है।
एक सिपाही को समय पर अवकाश नहीं मिलता है। वो मानसिक रूप से इतना परेशान रहता है।जितना कोई नही।
50% से ज्यादा पुलिसकर्मी किसी ना किसी बीमारी से पीड़ित है।
आखिर उसका जिम्मेदार कोन है।
आखिर इस बेबस और लाचार पुलिस प्रणाली का जिम्मेदार कोन है।
आखिर क्यों पुलिस को जीने और बोलने का अधिकार क्यों नहीं है।
आखिर क्यो उनको आवाज उठाने का अधिकार नहीं है।
आखिर क्यों उनको यूनियन बनाने का अधिकार नही है।

आखिर कब तक , आखिर कब तक

✍️_______________________________✍️
लेखक -:
🍁 super Cøp Ràksá की कलम से ✍️


Comments

Popular posts from this blog

खाकी

भीष्म पितामह की जीवनी / सुविचार

एक कैदी का जीवन